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7/08/2016

दिल्ली के शानदार मुग़ल स्मारक!


July 08.2016
पुराने स्मारक हमेशा से ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, खास कर उन लोगों को जिनकी रूचि और झुकाव ज़्यादातर इतिहास, कला और आर्किटेक्चर में होती है। ऐसे में स्मारक सबसे मुख्य आकर्षण के केंद्र होते हैं। भारत में कई ऐसे स्मारक हैं जिनको अलग अलग विषयों पर बनाया गया है और सबकी आर्किटेक्चरल स्टाइल भी अलग हैं। चलिए हम आपको ऐसे ही कुछ स्मारकों की झलक दिखाते हैं जिन्हें इस्लामिक आर्किटेक्चरल स्टाइल से बनाया गया है।
तो चलिए चलते हैं हम इन्हीं स्मारकों की सैर पर, देश की राजधानी दिल्ली में।

                                                                                                                                       
                                                                                 अलाई दरवाज़ा
क़ुतुब मीनार के परिसर में ही बने इस शानदार स्मारक को अलाउद्दीन खिलजी ने बनवाया था। भारत का सबसे पहला स्मारक जिसे इस्लामिक आर्किटेक्चरल स्टाइल से बनाया गया था। इसे लाल बलुई पत्थर से, सफेद मार्बल द्वारा अलंकृत करके बनाया गया। आपको यहाँ नश्क स्क्रिप्ट लिखी हुई शिलालेख भी इसके दीवारों पर देखने को मिलेगी। आप इसके किनारे में बारीकी से करी गयी कारीगरी और मेहराब भी देखेंगे जो कमल के कली की तरह लगती हैं, यह इस स्मारक की खूबसूरती को और भी बढ़ाती है।


लाल किला
जैसे ही आप दिल्ली का नाम सुनते हो सबसे पहले आपके दिमाग़ में आता है वहाँ का शान लाल किला। यह वा स्मारक है जिसका भारत में मुग़लों के शासन के समय सबसे ज़्यादा महत्व था, जिसे शाहजहाँ ने बनवाया था। पूरा स्मारक लाल बलुई पत्थर से बना हुआ है जिसमें जटिल कैलिग्राफी और फूलों की कला को इस अष्टकोण स्मारक की दीवार पर उकेरा गया है। इसे बनाने में लगभग दशकों का समय लगा था।


क़ुतुब मीनार
दिल्ली का एक और, लंबा और शानदार स्मारक जिसे देखने को दूर दूर से पर्यटक आते हैं। इस स्मारक को जिसमें 5 इमारत बालकनियाँ हैं, 3 अलग अलग शासकों द्वारा बनवाई गयी थी। और इसके आर्किटेक्चर में अलग तरह का स्टाइल बिल्कुल ही साफ नज़र आता है। इस स्मारक की लंबाई 73 मीटर उँची है और यह बिल्कुल भी अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर हम इसे पुराने ज़माने का गगन चुंबी इमारत कहें। जैसा की हमने आपको बताया कि यह 5 मंज़िली इमारत 3 अलग शासन में बनी थी, इसकी वजह से इसकी पहली 3 इमारतें लाल बलुई पत्थर की बनी हैं और बाकी की दो संगमरमर और बलुई पत्थर से।


सफ़दरजंग का मकबरा
समाधी से समर्पित सफ़दरजंग का यह स्मारक दिल्ली का सबसे अंतिम में बाग में बना स्मारक है। इस जगह पर आप ज़रूर ही जाएँ जब भी दिल्ली की यात्रा पर जाएँ। इस स्मारक में चलने के लिए काफ़ी विशाल रास्ते हैं और इसका मकबरा सफेद संगमरमर से बनाया गया है जबकि बाकी की पूरी इमारत लाल बलुई पत्थर से। स्मारक में बहुत सारी छतरियाँ भी हैं और जैसा की यह बाग में बना मकबरा है यहाँ आपको कई तालाब और फव्वारे भी देखने को मिलेंगे।


हुमायूँ का मकबरा
लाल बलुई पत्थर से बना,यह अष्तकोण और उच्च स्तरीय मेहराब का मकबरा पर्शियन आर्किटेक्चर का एक क्लासिक उदाहरण है। यह सबसे पहला, बाग में बना स्मारक है जिसे हुमायूँ के निधन के 8 साल बाद बनाया गया था। यहाँ पर आपको चैनलों से जुड़े पूल और दक्षिण और पश्चिम दोनों तरफ प्रवेश द्वार देखने को मिलेंगे। मुग़ल आर्किटेक्चर के मूल को इस स्मारक में पूरी तरीके से दिखाया गया है।


ईसा ख़ान का मकबरा
यह मकबरा उसी परिसर में स्थित है जहाँ हुमायूँ का मकबरा है। और यह संकेन गार्डेन स्टाइल का सबसे क्लासिक उदाहरण है। यह मकबरा महान ईसा ख़ान को समर्पित है और इस मकबरे को खूबसूरत टाइलों, बरामदाओं और जालीदार खिड़कियों से सजाया गया है। अपनी दिल्ली की यात्रा में इस स्मारक की भी यात्रा ज़रूर करें।
दिल्ली की अपनी मज़ेदार यात्रा में इन स्मारकों और इनकी कारीगरी को देखकर आप ज़रूर ही आश्चर्य चकित और अवाक रह जाएँगे।

इंडिया के 18 ऐसे आश्चर्य और जगहें, जिन्हें नहीं देखा तो फ़िर क्या देखा!


July 08.2016


इंडिया पूरी दुनिया में ऐसी जगह है, जहां के लोग कड़कड़ाती ठंड, बरसात और चिलचिलाती गर्मी का आनंद उठाते हैं. इंडिया वो देश है जहां नदियां, समंदर, पहाड़ियां, घाटियां, समतल मैदान और रेगिस्तान के साथ-साथ ऐसा सब-कुछ है जिस पर इंडियंस को गर्व है. न सिर्फ़ नजारे बल्कि कुछ ऐसे अद्भुत जानवर भी जिन्हें आप इंडिया के अलावा कहीं और नहीं पा सकते, जिन्हें देखने के लिए दुनिया भर से सैलानी इंडिया आते हैं और मंत्रमुग्ध होकर वापस जाते हैं.

1. व्हाइट टाइगर्स (बंगाल)
बंगाल टाइगर्स जहां पूरी दुनिया में फेमस हैं, वहीं व्हाइट टाइगर्स की खूबसूरती के कहने ही क्या. और इन्हें पहले-पहल फेम और पहचान रीवा के राजा ने दिलायी थी, जिनके पास सफेद टाइगर्स का जोड़ा था.



2. स्नो लेपर्ड (हिमांचल)
स्नो लेपर्ड या हिम तेंदुआ एक विडाल प्रजाति है जो मध्य एशिया, खासतौर पर हिमांचल के इलाके में पाया जाता है. स्नो लेपर्ड एक संरक्षित प्रजाति है और ये बिल्ली परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य है.



3. रॉयल बंगाल टाइगर (रणथंभौर, राजस्थान)
रॉयल बंगाल टाइगर इंडिया और बांग्लादेश दोनो देशों का राष्ट्रीय पशु है. जिसके शरीर पर दिखती हुई भूरी और काली धारियां इसे विशेष रूप से सज्जित करती हैं.



4. एशियाई लॉयन (गिर, गुजरात)
इंडिया के गिर, गुजरात में विशेष रूप से पाये जाने वाले और संरक्षित इस जंगल के राजा को कौन नहीं जानता. मगर आज ये प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है. और सरकार आज के दौर में इनका विशेष ख़याल रख रही है.




5. व्हाइट मोर
मोर हमारे देश के राष्ट्रीय पक्षी के तौर पर जाना जाता है, मगर उस ख़ूबसूरत से दिखने वाले इंद्रधनुषी मोर के ही परिवार में सफेद मोर भी पाया जाता है. ये सफेद मोर “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” प्रजाति में शामिल है. और इसकी छटा और जलवे तो बस देखते ही बनते हैं.




6. सुंदरबन डेल्टा (पश्चिम बंगाल)
सुंदरबन डेल्टा दुनिया के सबसे बड़े सदाबहार वन का केन्द्र है, साथ ही सबसे उपजाऊ भी. सुंदरबन का नाम यहां पायी जाने वाले सुंदरी पेड़ों की वजह से पड़ा है, जो मंग्रूव फॉरेस्ट के रूप में प्रचलित हैं. यह रॉयल टाइगर्स का आख़िरी संरक्षित क्षेत्र और टाइगर संरक्षण परियोजना का स्थल है जहां खेती-बाड़ी भी होती है.



7. थार मरुस्थल (राजस्थान)
जहां तक नज़रें जा सकती हों, सिर्फ़ बालू ही बालू हो और साथ ही हो सन्नाटा. ऐसी कल्पना तो सभी करते हैं. मगर ऐसे नज़ारे को साक्षात देखने के लिए आपको राजस्थान का सफ़र करना होगा और “रेगिस्तान का जहाज” ऊंट आपकी इसमें ख़ासी मदद कर सकता है. विश्वास मानिए ये कुछ ऐसा नज़ारा होगा जिसे आप ज़िंदगी भर नहीं भूल पायेंगे.




8. ग्रीन माउंटेन (शिवालिक, मुन्नार)
हरियाली एक ऐसा नज़ारा होता है जिससे देखते-देखते हमारा मन कभी नहीं भरता और ये नज़ारे कहीं किसी पहाड़ पर देखने को मिले तो फ़िर क्या कहने. मुन्नार के ग्रीन माउंटेन फॉरेस्ट तो जैसे आंखों को सुकून देने के लिए ही बने हैं जिसे हर किसी को अपनी ज़िंदगी में कम-से-कम एक बार तो ज़रूर देखना चाहिए.




9. कच्छ का रण (गुजरात)
रण शब्द हिंदी से आता है जिसका अर्थ रेगिस्तान होता है. भारत के गुजरात प्रांत के कच्छ जिले में यह अजीबो-गरीब मरुस्थल है जहां गर्मियों में तापमान 44-45 डिग्री और सर्दियों में 0 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है. कच्छ के रण की पश्चिमी सीमा हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से मिलती है.



10. ज्वालामुखी बैरन आईलैंड (अंडमान)
पोर्ट ब्लेयर से 139 कि.मी की समुद्री यात्रा पर बैरन अर्थात् ऊसर द्वीप हैं, जहां ऐक्टिव ज्वालामुखी देखे जा सकते हैं. ये ज्वालामुखी अब तक दो बार 1991 और 1994-1995 में लगभग 177 वर्षों के बाद जाग उठा था. इस आईलैंड को फॉरेस्ट डिपार्टमेंट से परमिशन के बाद चार्टर्ड बोट्स के माध्यम से देखा जा सकता है.




11. लोकटक लेक (मणिपुर)
इंडिया का नार्थ-इस्टर्न पार्ट आज भी अधिकतर लोगों के द्वारा देखा नहीं गया है, ये हिस्सा ख़ुद में इतना कुछ छिपाये हुए है कि इसके वर्णन में सुबह से शाम हो जाएगी. और इसी क्रम में आता है लोकटक या फ्लोटिंग लेक जो लगभग 286 कि.मी एरिया में फैला हुआ है, जिसकी ख़ूबसूरती तो बस देखते ही बनती है.




12. पेड़ों से बने हुए पुल (खासी, मेघालय)
इंडिया के नार्थ-ईस्ट के मेघालय राज्य में पाये जाने वाले सुपर-नेचुरल पुल प्रकृति से सामंजस्य का अद्भुत नज़ारा है. पेड़ों की जड़ों से ही निर्मित ये पुल यहां के लोगों की ज़रूरत का हिस्सा है क्योंकि यहां ख़ूब बरसात होती है और पकी लकड़ी जल्दी खराब होती है. इस पुल को बनने में लगभग 10 से 15 साल लगते हैं, जो एक समय पर लगभग 50 लोग का भार उठा सकता है.




13. मैगनेटिक हिल (लेह)
मैगनेटिक हिल या ग्रैविटी हिल के नाम से प्रसिद्ध इस पहाड़ी की खासियत है कि, इसके नजदीक यदि आप अपनी गाड़ी बंद कर के छोड़ देंगे तो ये ख़ुद की ओर गाड़ी को खींचती है जिसे महसूस करने के लिए सैलानी ख़ासतौर पर वहां जाते हैं. ये चुंबकीय पहाड़ी लेह से लगभग 30 कि.मी. पर स्थित है.




14. गरम पानी का सोता (मणिकारण गुरुद्वारा, मनाली)
मनाली न सिर्फ़ ख़ूबसूरत जगह है, बल्कि वहां प्रकृति का एक चमत्कार भी विराजमान है वो भी गुरुद्वारे में जहां एक गरम पानी का श्रोत है. गुरुद्वारे के भंडारे के लिए भोजन भी इसी श्रोत के पानी में पकाया जाता है.




15. ब्रम्हपुत्रा नदी (आसाम)
नदियों को दुनिया की सबसे पुरानी सड़क यूं ही नहीं कहा जाता. और बात यदि ब्रम्हपुत्रा की हो रही हो तो फ़िर क्या कहना बाकी रह जाता है. ब्रम्हपुत्रा दुनिया के सबसे बड़ी नदियों में से एक है जो एक बहुत बड़े भू-भाग को सिंचित करती है और साथ ही व्यापार का सबसे सरल-सुगम और सस्ता साधन भी है. और आज के आधुनिक दौर में भी ये अपनी ख़ूबसूरती और यूनिकनेस बचाए हुए है. और इस पर क्रूस के तो क्या कहने!



16. बेलम केव्स (आंध्रप्रदेश)
आंध्रप्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित ये गुफाएं इंडिया की दूसरी सबसे बड़ी गुफाएं हैं. आंध्रप्रदेश की राज्य सरकार ने इनको बहुत ही बढ़िया ढंग से संरक्षित और सुरक्षित रखा है. इसकी बनावट के पीछे हजारों साल पहले बहने वाली नदियों का बड़ा योगदान रहा है जिन्होंने इन्हें ऐसा रूप प्रदान किया है.




17. हाथी मत्था (महाबलेश्वर, महाराष्ट्र)
हाथी के सूंड और माथे की आकृति जैसा दिखने वाला ये पहाड़ किसी भी दर्शक के लिए अजूबे जैसा ही है. ये पूरी तरह नेचुरल है जो वेस्टर्न घाटों का हिस्सा है. और बाकी का काम यहां का सदाबहार मौसम कर देता है. तो अगली बार जब आप महाराष्ट्र जायें तो यहां जाना कतई न भूलें!




18. भेड़ाघाट (जबलपुर, मध्यप्रदेश)
नर्मदा नदी की जबरदस्त धार और वो भी संगमरमर के पहाड़ों के बीच कुछ ऐसा नज़ारा प्रस्तुत करती है कि उन्हें देख कर दिल बाग-बाग हो जाता है. नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की 100 फुट तक ऊंची चट्टानें भेड़ाघाट को एक मनोरम और सजीव स्थल में परिवर्तित कर देती हैं.






7/07/2016

सात अजूबे इस दुनिया में... जानिए इनकी खासियत!  

July 07.2016

 क्या आपको पता है दुनिया के सात अजूबों के बारें में आखिर क्या है इनमें खास जो ये हैं दुनिया के वेस्ट अजूबे, अगर नहीं तो आपको हम बताते हैं।

क्राइस्ट द रिडीमर (Christ the Redeemer): जीसस क्राइस्ट का यह स्टैच्यू ' क्राइस्ट द रिडीमर ' ब्राजील में रियो-डि-जनेरो के कार्कोवैडो पर्वत की चोटी पर स्थित है। यह स्टाच्यू 32 मी. ऊंचा है और इसका वजन 700 टन है। इसका निर्माण 1922 से 1931 के बीच हुआ. यह बहुत ही नवीन है. रात के समय इसका नजारा अद्वितीय होता है.



चीन की दीवार (Great Wall of China): यह दीवार 5वीं सदी ईसा पूर्व में बननी चालू हुई थी और 16 वीं सदी तक बनती रही. यह चीन की उत्तरी सीमा पर बनाई गयी थी. यह संसार की सबसे लम्बी मानव निर्मित रचना है जो लगभग4000 मील (6,400 किलोमीटर) तक फैली है. इसकी ऊंचाई 35 फुट है जो इसे सुरक्षा देती है.



जार्डन का ‘पेट्रा’ (Petra): ऐतिहासिक शहर पेट्रा यहां तरह तरह की इमारतें है जो लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं और सब पर बेहतरीन नक्काशी की गई है. इसमें138 फुट ऊंचा मंदिर, नहरें, पानी के तालाब तथा खुला स्टेडियम है. ‘पेट्रा’ जॉर्डन के लिए विशेष महत्व रखता है



ताजमहल (Tajmahal): भारत के मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया था. यह 1632 में बना और 15 साल में पूरा हुआ. यह खूबसूरत गुंबदों वाला महल चारों तरफ बगीचों से घिरा है. मुगल शिल्पकला का यह सबसे बढ़िया उदाहरण माना जाता है.



रोम का कॉलोसियम (Colosseum of Rome) : यह एक विशाल खेल स्टेडियम है. जिसे लगभग 70 सदी में सम्राट वेस्पेसियन (Vespasian) ने बनाना चालू किया था. इसमें 50,000 तक लोग इकट्‌ठे होकर जंगली जानवरों और गुलामों की खूनी लड़ाइयों के खेल देखते थे. इस स्टेडियम में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे. इस स्टेडियम की नकल करना आज तक नामुमकिन है.



माचू पिच्चू (Machu Picchu): 15वीं शताब्दी में सतह से 2430 मीटर ऊपर यानि एक पहाड़ी के ऊपर बने एक शहर में रहना और उस शहर को बनाना अपने आप में अजूबा ही है. दक्षिण अमरीका में एंडीज पर्वतों के बीच बसा ‘माचू पिच्चू शहर’ पुरानी इंका सभ्यता का सबसे बड़ा उदाहरण है. माना जाता है कि कभी यह नगरी संपन्न थी पर स्पेन के आक्रमणकारी अपने साथ चेचक जैसी बीमारी यहां ले आए जिससे यह शहर पूरी तरह तबाह हो गया.



चिचेन इत्जा (Chichen Itza): मेक्सिको में बसी चिचेन इत्जा नामक यह इमारत दुनिया में माया सभ्यता के गौरवपूर्ण काल की गाथा गाती है. शहर के बीचोबीच कुकुलकन का मंदिर है जो 79 फीट की ऊंचाई तक बना है. इसकी चार दिशाओं में 91सीढ़ियां हैं. प्रत्येक सीढ़ी साल के एक दिन का प्रतीक है और 365 वां दिन ऊपर बना चबूतरा है।



दुनिया के 10 सबसे मोटे लोग (Top 10 Fattest people in world)


July 06.2016

टेरी स्मिथ, अमेरिका (Teri Smith, America)




जॉन ब्रोअर, ऑस्ट्रेलिया (Jon Brower Minnacoh, Australia)



केनेथ ब्रमले, अमेरिका (Kenneth Brumley, America)





मैनुअल यूरीब, मैक्सिको (Manuel Uribe, Mexico)



मायरा रोसेल्स, अमेरिका (Mayra Rosales, America)



माइकल हैबरानको, अमेरिका (Michael Hebranko, America)



पॉल मेसन, इंग्लैंड (Paul Mason, England)



रॉबर्ट अर्ल ह्यूज़, अमेरिका (Robert Earl Hughes, America)




7/06/2016

हॉन्टेड विलेज “कुलधरा” – एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान – रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा

July 05.2016

Kuldhara History & Story In Hindi : हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा(Kuldhara) गाँव कि, यह गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं। कुलधरा(Kuldhara) गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं।

कहा जाता है कि यह गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हैं, कभी एक हंसता खेलता यह गांव आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है| टूरिस्ट प्लेस में बदल चुके कुलधरा गांव घूमने आने वालों के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि कोई आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें आती हैं, महिलाओं के बात करने उनकी चूडिय़ों और पायलों की आवाज हमेशा ही वहां के माहौल को भयावह बनाते हैं। प्रशासन ने इस गांव की सरहद पर एक फाटक बनवा दिया है जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने की कोई हिम्मत नहीं करता हैं।



वैज्ञानिक तरीके से हुआ था गाँव का निर्माण
कुलधरा(Kuldhara) जैसलमेर से लगभग अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है । पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और यह उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था। कुलधरा गाँव पूर्ण रूप से वैज्ञानिक तौर पर बना था। ईट पत्थर से बने इस गांव की बनावट ऐसी थी कि यहां कभी गर्मी का अहसास नहीं होता था। कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्ताकन में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । इस जगह गर्मियों में तापमान 45 डिग्री रहता हैं पर आप यदि अब भी भरी गर्मी में इन वीरान पडे मकानो में जायेंगे तो आपको शीतलता का अनुभव होगा। गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी । घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं ।

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पालीवाल ब्राम्हण होते हुए भी बहुत ही उद्यमी समुदाय था । अपनी बुद्धिमत्ताl, अपने कौशल और अटूट परिश्रम के रहते पालीवालों ने धरती पर सोना उगाया था । हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्तापनी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की परिकल्पलना की थी । रेगिस्ता़न में खेती । पालीवालों के समृद्धि का रहस्य था । जिप्सरम की परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना । पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्की कर पाए थे ।

पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था । और बड़ी शान से जीता था । जिप्सआम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल खेती करते । और ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्तं फसल पैदा करते । पालीवालों के जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार रेगिस्तारन को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्ताकन बनाया । पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था ।


कुलधरा के वीरान होने कि कहानी (Story of Kuldhara)
जो गाँव इतना विकसित था तो फिर क्या वजह रही कि वो गाँव रातों रात वीरान हो गया। इसकी वजह था गाँव का अय्याश दीवान सालम सिंह जिसकी गन्दी नज़र गाँव कि एक खूबसूरत लड़की पर पड़ गयी थी। दीवान उस लड़की के पीछे इस कदर पागल था कि बस किसी तरह से उसे पा लेना चाहता था। उसने इसके लिए ब्राह्मणों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। हद तो तब हो गई कि जब सत्ता के मद में चूर उस दीवान ने लड़की के घर संदेश भिजवाया कि यदि अगले पूर्णमासी तक उसे लड़की नहीं मिली तो वह गांव पर हमला करके लड़की को उठा ले जाएगा। गांववालों के लिए यह मुश्किल की घड़ी थी। उन्हें या तो गांव बचाना था या फिर अपनी बेटी। इस विषय पर निर्णय लेने के लिए सभी 84 गांव वाले एक मंदिर पर इकट्ठा हो गए और पंचायतों ने फैसला किया कि कुछ भी हो जाए अपनी लड़की उस दीवान को नहीं देंगे।

फिर क्या था, गांव वालों ने गांव खाली करने का निर्णय कर लिया और रातोंरात सभी 84 गांव आंखों से ओझल हो गए। जाते-जाते उन्होंने श्राप दिया कि आज के बाद इन घरों में कोई नहीं बस पाएगा। आज भी वहां की हालत वैसी ही है जैसी उस रात थी जब लोग इसे छोड़ कर गए थे।


आज भी है श्राप का असर:
पालीवाल ब्राह्मणों के श्राप का असर यहां आज भी देखा जा सकता है। जैसलमेर के स्थानीय निवासियों की मानें तो कुछ परिवारों ने इस जगह पर बसने की कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके। स्थानिय लोगों का तो यहां तक कहना है कि कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जो वहां गए जरूर लेकिन लौटकर नहीं आए। उनका क्या हुआ, वे कहां गए कोई नहीं जानता।


यहां के धरती में दबा है सोना इसलिए आते हैं पर्यटक:
पर्यटक यहां इस चाह में आते हैं कि उन्हें यहां दबा हुआ सोना मिल जाए। इतिहासकारों के मुताबिक पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी संपत्ति जिसमें भारी मात्रा में सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात थे, उसे जमीन के अंदर दबा रखा था। यही वजह है कि जो कोई भी यहां आता है वह जगह-जगह खुदाई करने लग जाता है। इस उम्मीद से कि शायद वह सोना उनके हाथ लग जाए। यह गांव आज भी जगह-जगह से खुदा हुआ मिलता है।


पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कि कुलधरा में पड़ताल :-
मई 2013 मे दिल्ली से आई भूत प्रेत व आत्माओं पर रिसर्च करने वाली पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कुलधरा(Kuldhara) गांव में बिताई रात। टीम ने माना कि यहां कुछ न कुछ असामान्य जरूर है। टीम के एक सदस्य ने बताया कि विजिट के दौरान रात में कई बार मैंने महसूस किया कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, जब मुड़कर देखा तो वहां कोई नहीं था। पेरानॉर्मल सोसायटी के उपाध्यक्ष अंशुल शर्मा ने बताया था कि हमारे पास एक डिवाइस है जिसका नाम गोस्ट बॉक्स है। इसके माध्यम से हम ऐसी जगहों पर रहने वाली आत्माओं से सवाल पूछते हैं। कुलधरा में भी ऐसा ही किया जहां कुछ आवाजें आई तो कहीं असामान्य रूप से आत्माओं ने अपने नाम भी बताए। शनिवार चार मई की रात्रि में जो टीम कुलधरा गई थी उनकी गाडिय़ों पर बच्चों के हाथ के निशान मिले। टीम के सदस्य जब कुलधरा गांव में घूमकर वापस लौटे तो उनकी गाडिय़ों के कांच पर बच्चों के पंजे के निशान दिखाई दिए। (जैसा कि कुलधरा(Kuldhara) गई टीम के सदस्यों ने मीडिया को बताया )

7/03/2016

अदभुत – एक इंसान जो लाशों को बदल देता है डायमंड में


July 03.2016

   

Hindi Story of Rinaldo Willy : The Man Who Transforms Corpses into Diamonds – यदि आप अपने किसी प्रियजन कि मृत्यु के बाद उसकी यादों को डायमंड के रूप में सहज के रखना चाहे तो आप संपर्क करे रिनाल्डो विल्ली (Rinaldo Willy) से जिनका काम लाशों को डायमंड में परिवर्तित करना है। यह बात सुनने में बड़ी ही अजीब लग सकती है पर यह है एकदम सत्य।



स्विट्ज़रलैंड के रिनाल्डो विल्ली एक कम्पनी Algordanza चलाते है जहा कि उन्नत तकनीको का प्रयोग करते हुए, इंसान के अंतिम संस्कार के बाद बची राख को डायमंड में परिवर्तित किया जाता है। Algordanza एक स्विस शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है “यादें” । कंपनी हर साल लगभग 850 लाशों को डायमंड में तब्दील कर देती है। इस काम कि कॉस्टिंग डायमंड के साइज़ पर निर्भर करती है जो कि 3 लाख से 15 लाख के बीच बैठती है।

कैसे आया यह विचार :-
रिनाल्डो विल्ली को ह्यूमन एशेज से डायमंड बनाने का विचार कैसे आया इसकी कहनी भी बड़ी रोचक है। लगभग 10 साल पहले रिनाल्डो के एक टीचर ने उसे एक आर्टिकल पढ़ने को दिया जो कि सेमी कंडेक्टर इंडस्ट्री में प्रयोग होने वाले सिंथेटिक डायमंड के उत्पादन के ऊपर था। उस आर्टिकल में यह बताया गया था कि किस तरह एशेज( राख ) से डायमंड बनाए जा सकते है। रिनाल्डो ने गलती से इसे ह्यूमन एशेज समझ लिया जबकि आर्टिकल में वेजिटेबल एशेज का जिक्र था।

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रिनाल्डो को यह आईडिया पसंद आया और उसने अपने टीचर से ह्यूमन एशेज को डायमंड में बदलने के ऊपर और जानकारी मांगी। तब टीचर ने उसे बताया कि तुम गलत समझ रहे हो या ह्यूमन एशेज कि नहीं बल्कि वेजिटेबल एशेज कि बात हो रही है। इस अपर रिनाल्डो ने कहा कि अगर वेजिटेबल एशेज को डायमंड में बदला जा सकता है तो ह्यूमन एशेज को क्यों नहीं ? टीचर को यह विचार पसंद आया और उसने उस आर्टिकल के लेखक से संपर्क किया, जो कि वही स्विट्ज़रलैंड में रहता था तथा जिसके पास सिंथेटिक डायमंड बनाने कि कुछ मशीने थी। फिर उन्होंने उस आईडिया पर मिल के काम किया और कम्पनी Algordanza अस्तित्व में आई।

कैसे बनता है डायमंड : –
ह्यूमन एशेज से डायमंड बनाने के लिए वो सबसे पहले ह्यूमन एशेज को स्विट्ज़रलैंड स्तिथ अपनी लैब में मंगवाते है। लैब में एक विशेष प्रकिया के द्वारा उस ह्यूमन एशेज से कार्बन को अलग किया जाता है। इस कार्बन को बहुत अधिक तापमान पर गर्म करके ग्रेफाइट में परिवर्तित किया जाता है। फिर इस ग्रेफाइट को एक मशीन में रखा जाता है जहा पर ऐसी कंडीशन बनाई जाती है जैसी कि जमीन के बहुत नीचे होती है यानि कि बहुत अधिक दवाब और बहुत अधिक तापमान। इस कंडीशन में ग्रेफाइट को कुछ महीनो के लिए रखा जाता है जिससे कि वो ग्रेफाइट डायमंड में बदल जाता है।



सिंथेटिक डायमंड और रियल डायमंड में फर्क :-
रासायनिक संरचना और गुणों के आधार पे सिंथेटिक डायमंड और रियल डायमंड में कोई फर्क नहीं होता है। दोनों कि रासायनिक संरचना और रासायनिक गुण समान होते है। एक मात्र फर्क इनकी कीमतो में होता है। रियल डायमंड, सिंथेटिक डायमंड से महंगे आते है। इन दोनों डायमंड में फर्क करना बहुत मुश्किल होता है यहाँ तक कि एक अनुभवी ज्वेलर्स भी उनमे फर्क नहीं कर सकता है। इनमे फर्क करने का एक मात्र तरीका केमिकल स्क्रीनिंग है जो कि लैब में हो सकती है।



वर्ल्ड में इनकी फिलहाल 12 देशों में ब्रांच है, जिनमे से एशिया में 4 (जापान, सिंगापूर, हांगकांग, थाइलैंड) है। जहा कि आप अपना आर्डर दे सकते है। भारत में फिलहाल ब्रांच नहीं है। Algordanza के टोटल बिज़नस में अकेले जापान का हिस्सा 25 पर्सेंट है। इसके दो कारण है एक तो जापानिओ का अपनों के प्रति कुछ ज्यादा ही लगाव होता है और दूसरा वहाँ अधिकतर लोगो का विधुत शवगृह में अंतिमसंस्कार किया जाता है जिससे कि ह्यूमन एशेज प्राप्त हो जाती है। जबकि वेस्टर्न कन्ट्रीज में अधिकतर शवो को दफनाया जाता है।

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