General knowledge.World ki beautiful jagah ki jankari.world amazing jankari

7/08/2016

इंडिया के 18 ऐसे आश्चर्य और जगहें, जिन्हें नहीं देखा तो फ़िर क्या देखा!


July 08.2016


इंडिया पूरी दुनिया में ऐसी जगह है, जहां के लोग कड़कड़ाती ठंड, बरसात और चिलचिलाती गर्मी का आनंद उठाते हैं. इंडिया वो देश है जहां नदियां, समंदर, पहाड़ियां, घाटियां, समतल मैदान और रेगिस्तान के साथ-साथ ऐसा सब-कुछ है जिस पर इंडियंस को गर्व है. न सिर्फ़ नजारे बल्कि कुछ ऐसे अद्भुत जानवर भी जिन्हें आप इंडिया के अलावा कहीं और नहीं पा सकते, जिन्हें देखने के लिए दुनिया भर से सैलानी इंडिया आते हैं और मंत्रमुग्ध होकर वापस जाते हैं.

1. व्हाइट टाइगर्स (बंगाल)
बंगाल टाइगर्स जहां पूरी दुनिया में फेमस हैं, वहीं व्हाइट टाइगर्स की खूबसूरती के कहने ही क्या. और इन्हें पहले-पहल फेम और पहचान रीवा के राजा ने दिलायी थी, जिनके पास सफेद टाइगर्स का जोड़ा था.



2. स्नो लेपर्ड (हिमांचल)
स्नो लेपर्ड या हिम तेंदुआ एक विडाल प्रजाति है जो मध्य एशिया, खासतौर पर हिमांचल के इलाके में पाया जाता है. स्नो लेपर्ड एक संरक्षित प्रजाति है और ये बिल्ली परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य है.



3. रॉयल बंगाल टाइगर (रणथंभौर, राजस्थान)
रॉयल बंगाल टाइगर इंडिया और बांग्लादेश दोनो देशों का राष्ट्रीय पशु है. जिसके शरीर पर दिखती हुई भूरी और काली धारियां इसे विशेष रूप से सज्जित करती हैं.



4. एशियाई लॉयन (गिर, गुजरात)
इंडिया के गिर, गुजरात में विशेष रूप से पाये जाने वाले और संरक्षित इस जंगल के राजा को कौन नहीं जानता. मगर आज ये प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है. और सरकार आज के दौर में इनका विशेष ख़याल रख रही है.




5. व्हाइट मोर
मोर हमारे देश के राष्ट्रीय पक्षी के तौर पर जाना जाता है, मगर उस ख़ूबसूरत से दिखने वाले इंद्रधनुषी मोर के ही परिवार में सफेद मोर भी पाया जाता है. ये सफेद मोर “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” प्रजाति में शामिल है. और इसकी छटा और जलवे तो बस देखते ही बनते हैं.




6. सुंदरबन डेल्टा (पश्चिम बंगाल)
सुंदरबन डेल्टा दुनिया के सबसे बड़े सदाबहार वन का केन्द्र है, साथ ही सबसे उपजाऊ भी. सुंदरबन का नाम यहां पायी जाने वाले सुंदरी पेड़ों की वजह से पड़ा है, जो मंग्रूव फॉरेस्ट के रूप में प्रचलित हैं. यह रॉयल टाइगर्स का आख़िरी संरक्षित क्षेत्र और टाइगर संरक्षण परियोजना का स्थल है जहां खेती-बाड़ी भी होती है.



7. थार मरुस्थल (राजस्थान)
जहां तक नज़रें जा सकती हों, सिर्फ़ बालू ही बालू हो और साथ ही हो सन्नाटा. ऐसी कल्पना तो सभी करते हैं. मगर ऐसे नज़ारे को साक्षात देखने के लिए आपको राजस्थान का सफ़र करना होगा और “रेगिस्तान का जहाज” ऊंट आपकी इसमें ख़ासी मदद कर सकता है. विश्वास मानिए ये कुछ ऐसा नज़ारा होगा जिसे आप ज़िंदगी भर नहीं भूल पायेंगे.




8. ग्रीन माउंटेन (शिवालिक, मुन्नार)
हरियाली एक ऐसा नज़ारा होता है जिससे देखते-देखते हमारा मन कभी नहीं भरता और ये नज़ारे कहीं किसी पहाड़ पर देखने को मिले तो फ़िर क्या कहने. मुन्नार के ग्रीन माउंटेन फॉरेस्ट तो जैसे आंखों को सुकून देने के लिए ही बने हैं जिसे हर किसी को अपनी ज़िंदगी में कम-से-कम एक बार तो ज़रूर देखना चाहिए.




9. कच्छ का रण (गुजरात)
रण शब्द हिंदी से आता है जिसका अर्थ रेगिस्तान होता है. भारत के गुजरात प्रांत के कच्छ जिले में यह अजीबो-गरीब मरुस्थल है जहां गर्मियों में तापमान 44-45 डिग्री और सर्दियों में 0 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है. कच्छ के रण की पश्चिमी सीमा हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से मिलती है.



10. ज्वालामुखी बैरन आईलैंड (अंडमान)
पोर्ट ब्लेयर से 139 कि.मी की समुद्री यात्रा पर बैरन अर्थात् ऊसर द्वीप हैं, जहां ऐक्टिव ज्वालामुखी देखे जा सकते हैं. ये ज्वालामुखी अब तक दो बार 1991 और 1994-1995 में लगभग 177 वर्षों के बाद जाग उठा था. इस आईलैंड को फॉरेस्ट डिपार्टमेंट से परमिशन के बाद चार्टर्ड बोट्स के माध्यम से देखा जा सकता है.




11. लोकटक लेक (मणिपुर)
इंडिया का नार्थ-इस्टर्न पार्ट आज भी अधिकतर लोगों के द्वारा देखा नहीं गया है, ये हिस्सा ख़ुद में इतना कुछ छिपाये हुए है कि इसके वर्णन में सुबह से शाम हो जाएगी. और इसी क्रम में आता है लोकटक या फ्लोटिंग लेक जो लगभग 286 कि.मी एरिया में फैला हुआ है, जिसकी ख़ूबसूरती तो बस देखते ही बनती है.




12. पेड़ों से बने हुए पुल (खासी, मेघालय)
इंडिया के नार्थ-ईस्ट के मेघालय राज्य में पाये जाने वाले सुपर-नेचुरल पुल प्रकृति से सामंजस्य का अद्भुत नज़ारा है. पेड़ों की जड़ों से ही निर्मित ये पुल यहां के लोगों की ज़रूरत का हिस्सा है क्योंकि यहां ख़ूब बरसात होती है और पकी लकड़ी जल्दी खराब होती है. इस पुल को बनने में लगभग 10 से 15 साल लगते हैं, जो एक समय पर लगभग 50 लोग का भार उठा सकता है.




13. मैगनेटिक हिल (लेह)
मैगनेटिक हिल या ग्रैविटी हिल के नाम से प्रसिद्ध इस पहाड़ी की खासियत है कि, इसके नजदीक यदि आप अपनी गाड़ी बंद कर के छोड़ देंगे तो ये ख़ुद की ओर गाड़ी को खींचती है जिसे महसूस करने के लिए सैलानी ख़ासतौर पर वहां जाते हैं. ये चुंबकीय पहाड़ी लेह से लगभग 30 कि.मी. पर स्थित है.




14. गरम पानी का सोता (मणिकारण गुरुद्वारा, मनाली)
मनाली न सिर्फ़ ख़ूबसूरत जगह है, बल्कि वहां प्रकृति का एक चमत्कार भी विराजमान है वो भी गुरुद्वारे में जहां एक गरम पानी का श्रोत है. गुरुद्वारे के भंडारे के लिए भोजन भी इसी श्रोत के पानी में पकाया जाता है.




15. ब्रम्हपुत्रा नदी (आसाम)
नदियों को दुनिया की सबसे पुरानी सड़क यूं ही नहीं कहा जाता. और बात यदि ब्रम्हपुत्रा की हो रही हो तो फ़िर क्या कहना बाकी रह जाता है. ब्रम्हपुत्रा दुनिया के सबसे बड़ी नदियों में से एक है जो एक बहुत बड़े भू-भाग को सिंचित करती है और साथ ही व्यापार का सबसे सरल-सुगम और सस्ता साधन भी है. और आज के आधुनिक दौर में भी ये अपनी ख़ूबसूरती और यूनिकनेस बचाए हुए है. और इस पर क्रूस के तो क्या कहने!



16. बेलम केव्स (आंध्रप्रदेश)
आंध्रप्रदेश के कर्नूल जिले में स्थित ये गुफाएं इंडिया की दूसरी सबसे बड़ी गुफाएं हैं. आंध्रप्रदेश की राज्य सरकार ने इनको बहुत ही बढ़िया ढंग से संरक्षित और सुरक्षित रखा है. इसकी बनावट के पीछे हजारों साल पहले बहने वाली नदियों का बड़ा योगदान रहा है जिन्होंने इन्हें ऐसा रूप प्रदान किया है.




17. हाथी मत्था (महाबलेश्वर, महाराष्ट्र)
हाथी के सूंड और माथे की आकृति जैसा दिखने वाला ये पहाड़ किसी भी दर्शक के लिए अजूबे जैसा ही है. ये पूरी तरह नेचुरल है जो वेस्टर्न घाटों का हिस्सा है. और बाकी का काम यहां का सदाबहार मौसम कर देता है. तो अगली बार जब आप महाराष्ट्र जायें तो यहां जाना कतई न भूलें!




18. भेड़ाघाट (जबलपुर, मध्यप्रदेश)
नर्मदा नदी की जबरदस्त धार और वो भी संगमरमर के पहाड़ों के बीच कुछ ऐसा नज़ारा प्रस्तुत करती है कि उन्हें देख कर दिल बाग-बाग हो जाता है. नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की 100 फुट तक ऊंची चट्टानें भेड़ाघाट को एक मनोरम और सजीव स्थल में परिवर्तित कर देती हैं.






7/07/2016

सात अजूबे इस दुनिया में... जानिए इनकी खासियत!  

July 07.2016

 क्या आपको पता है दुनिया के सात अजूबों के बारें में आखिर क्या है इनमें खास जो ये हैं दुनिया के वेस्ट अजूबे, अगर नहीं तो आपको हम बताते हैं।

क्राइस्ट द रिडीमर (Christ the Redeemer): जीसस क्राइस्ट का यह स्टैच्यू ' क्राइस्ट द रिडीमर ' ब्राजील में रियो-डि-जनेरो के कार्कोवैडो पर्वत की चोटी पर स्थित है। यह स्टाच्यू 32 मी. ऊंचा है और इसका वजन 700 टन है। इसका निर्माण 1922 से 1931 के बीच हुआ. यह बहुत ही नवीन है. रात के समय इसका नजारा अद्वितीय होता है.



चीन की दीवार (Great Wall of China): यह दीवार 5वीं सदी ईसा पूर्व में बननी चालू हुई थी और 16 वीं सदी तक बनती रही. यह चीन की उत्तरी सीमा पर बनाई गयी थी. यह संसार की सबसे लम्बी मानव निर्मित रचना है जो लगभग4000 मील (6,400 किलोमीटर) तक फैली है. इसकी ऊंचाई 35 फुट है जो इसे सुरक्षा देती है.



जार्डन का ‘पेट्रा’ (Petra): ऐतिहासिक शहर पेट्रा यहां तरह तरह की इमारतें है जो लाल बलुआ पत्थर से बनी हैं और सब पर बेहतरीन नक्काशी की गई है. इसमें138 फुट ऊंचा मंदिर, नहरें, पानी के तालाब तथा खुला स्टेडियम है. ‘पेट्रा’ जॉर्डन के लिए विशेष महत्व रखता है



ताजमहल (Tajmahal): भारत के मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया था. यह 1632 में बना और 15 साल में पूरा हुआ. यह खूबसूरत गुंबदों वाला महल चारों तरफ बगीचों से घिरा है. मुगल शिल्पकला का यह सबसे बढ़िया उदाहरण माना जाता है.



रोम का कॉलोसियम (Colosseum of Rome) : यह एक विशाल खेल स्टेडियम है. जिसे लगभग 70 सदी में सम्राट वेस्पेसियन (Vespasian) ने बनाना चालू किया था. इसमें 50,000 तक लोग इकट्‌ठे होकर जंगली जानवरों और गुलामों की खूनी लड़ाइयों के खेल देखते थे. इस स्टेडियम में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे. इस स्टेडियम की नकल करना आज तक नामुमकिन है.



माचू पिच्चू (Machu Picchu): 15वीं शताब्दी में सतह से 2430 मीटर ऊपर यानि एक पहाड़ी के ऊपर बने एक शहर में रहना और उस शहर को बनाना अपने आप में अजूबा ही है. दक्षिण अमरीका में एंडीज पर्वतों के बीच बसा ‘माचू पिच्चू शहर’ पुरानी इंका सभ्यता का सबसे बड़ा उदाहरण है. माना जाता है कि कभी यह नगरी संपन्न थी पर स्पेन के आक्रमणकारी अपने साथ चेचक जैसी बीमारी यहां ले आए जिससे यह शहर पूरी तरह तबाह हो गया.



चिचेन इत्जा (Chichen Itza): मेक्सिको में बसी चिचेन इत्जा नामक यह इमारत दुनिया में माया सभ्यता के गौरवपूर्ण काल की गाथा गाती है. शहर के बीचोबीच कुकुलकन का मंदिर है जो 79 फीट की ऊंचाई तक बना है. इसकी चार दिशाओं में 91सीढ़ियां हैं. प्रत्येक सीढ़ी साल के एक दिन का प्रतीक है और 365 वां दिन ऊपर बना चबूतरा है।



दुनिया के 10 सबसे मोटे लोग (Top 10 Fattest people in world)


July 06.2016

टेरी स्मिथ, अमेरिका (Teri Smith, America)




जॉन ब्रोअर, ऑस्ट्रेलिया (Jon Brower Minnacoh, Australia)



केनेथ ब्रमले, अमेरिका (Kenneth Brumley, America)





मैनुअल यूरीब, मैक्सिको (Manuel Uribe, Mexico)



मायरा रोसेल्स, अमेरिका (Mayra Rosales, America)



माइकल हैबरानको, अमेरिका (Michael Hebranko, America)



पॉल मेसन, इंग्लैंड (Paul Mason, England)



रॉबर्ट अर्ल ह्यूज़, अमेरिका (Robert Earl Hughes, America)




7/06/2016

हॉन्टेड विलेज “कुलधरा” – एक श्राप के कारण 170 सालों से हैं वीरान – रात को रहता है भूत प्रेतों का डेरा

July 05.2016

Kuldhara History & Story In Hindi : हमारे देश भारत के कई शहर अपने दामन में कई रहस्यमयी घटनाओ को समेटे हुए है ऐसी ही एक घटना हैं राजस्थान के जैसलमेर जिले के कुलधरा(Kuldhara) गाँव कि, यह गांव पिछले 170 सालों से वीरान पड़ा हैं। कुलधरा(Kuldhara) गाँव के हज़ारों लोग एक ही रात मे इस गांव को खाली कर के चले गए थे और जाते जाते श्राप दे गए थे कि यहाँ फिर कभी कोई नहीं बस पायेगा। तब से गाँव वीरान पड़ा हैं।

कहा जाता है कि यह गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में हैं, कभी एक हंसता खेलता यह गांव आज एक खंडहर में तब्दील हो चुका है| टूरिस्ट प्लेस में बदल चुके कुलधरा गांव घूमने आने वालों के मुताबिक यहां रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों की आहट आज भी सुनाई देती है। उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि कोई आसपास चल रहा है। बाजार के चहल-पहल की आवाजें आती हैं, महिलाओं के बात करने उनकी चूडिय़ों और पायलों की आवाज हमेशा ही वहां के माहौल को भयावह बनाते हैं। प्रशासन ने इस गांव की सरहद पर एक फाटक बनवा दिया है जिसके पार दिन में तो सैलानी घूमने आते रहते हैं लेकिन रात में इस फाटक को पार करने की कोई हिम्मत नहीं करता हैं।



वैज्ञानिक तरीके से हुआ था गाँव का निर्माण
कुलधरा(Kuldhara) जैसलमेर से लगभग अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थिति है । पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और यह उनमें से एक था । मेहनती और रईस पालीवाल की कुलधार शाखा ने सन 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव को बसाया था। कुलधरा गाँव पूर्ण रूप से वैज्ञानिक तौर पर बना था। ईट पत्थर से बने इस गांव की बनावट ऐसी थी कि यहां कभी गर्मी का अहसास नहीं होता था। कहते हैं कि इस कोण में घर बनाए गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं । कुलधरा के ये घर रेगिस्ताकन में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे । इस जगह गर्मियों में तापमान 45 डिग्री रहता हैं पर आप यदि अब भी भरी गर्मी में इन वीरान पडे मकानो में जायेंगे तो आपको शीतलता का अनुभव होगा। गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े थे इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी । घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं ।

loading...



पालीवाल ब्राम्हण होते हुए भी बहुत ही उद्यमी समुदाय था । अपनी बुद्धिमत्ताl, अपने कौशल और अटूट परिश्रम के रहते पालीवालों ने धरती पर सोना उगाया था । हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्तापनी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की परिकल्पलना की थी । रेगिस्ता़न में खेती । पालीवालों के समृद्धि का रहस्य था । जिप्सरम की परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना । पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्की कर पाए थे ।

पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था । और बड़ी शान से जीता था । जिप्सआम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल खेती करते । और ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्तं फसल पैदा करते । पालीवालों के जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार रेगिस्तारन को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्ताकन बनाया । पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था ।


कुलधरा के वीरान होने कि कहानी (Story of Kuldhara)
जो गाँव इतना विकसित था तो फिर क्या वजह रही कि वो गाँव रातों रात वीरान हो गया। इसकी वजह था गाँव का अय्याश दीवान सालम सिंह जिसकी गन्दी नज़र गाँव कि एक खूबसूरत लड़की पर पड़ गयी थी। दीवान उस लड़की के पीछे इस कदर पागल था कि बस किसी तरह से उसे पा लेना चाहता था। उसने इसके लिए ब्राह्मणों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। हद तो तब हो गई कि जब सत्ता के मद में चूर उस दीवान ने लड़की के घर संदेश भिजवाया कि यदि अगले पूर्णमासी तक उसे लड़की नहीं मिली तो वह गांव पर हमला करके लड़की को उठा ले जाएगा। गांववालों के लिए यह मुश्किल की घड़ी थी। उन्हें या तो गांव बचाना था या फिर अपनी बेटी। इस विषय पर निर्णय लेने के लिए सभी 84 गांव वाले एक मंदिर पर इकट्ठा हो गए और पंचायतों ने फैसला किया कि कुछ भी हो जाए अपनी लड़की उस दीवान को नहीं देंगे।

फिर क्या था, गांव वालों ने गांव खाली करने का निर्णय कर लिया और रातोंरात सभी 84 गांव आंखों से ओझल हो गए। जाते-जाते उन्होंने श्राप दिया कि आज के बाद इन घरों में कोई नहीं बस पाएगा। आज भी वहां की हालत वैसी ही है जैसी उस रात थी जब लोग इसे छोड़ कर गए थे।


आज भी है श्राप का असर:
पालीवाल ब्राह्मणों के श्राप का असर यहां आज भी देखा जा सकता है। जैसलमेर के स्थानीय निवासियों की मानें तो कुछ परिवारों ने इस जगह पर बसने की कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके। स्थानिय लोगों का तो यहां तक कहना है कि कुछ परिवार ऐसे भी हैं, जो वहां गए जरूर लेकिन लौटकर नहीं आए। उनका क्या हुआ, वे कहां गए कोई नहीं जानता।


यहां के धरती में दबा है सोना इसलिए आते हैं पर्यटक:
पर्यटक यहां इस चाह में आते हैं कि उन्हें यहां दबा हुआ सोना मिल जाए। इतिहासकारों के मुताबिक पालीवाल ब्राह्मणों ने अपनी संपत्ति जिसमें भारी मात्रा में सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात थे, उसे जमीन के अंदर दबा रखा था। यही वजह है कि जो कोई भी यहां आता है वह जगह-जगह खुदाई करने लग जाता है। इस उम्मीद से कि शायद वह सोना उनके हाथ लग जाए। यह गांव आज भी जगह-जगह से खुदा हुआ मिलता है।


पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कि कुलधरा में पड़ताल :-
मई 2013 मे दिल्ली से आई भूत प्रेत व आत्माओं पर रिसर्च करने वाली पेरानार्मल सोसायटी की टीम ने कुलधरा(Kuldhara) गांव में बिताई रात। टीम ने माना कि यहां कुछ न कुछ असामान्य जरूर है। टीम के एक सदस्य ने बताया कि विजिट के दौरान रात में कई बार मैंने महसूस किया कि किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, जब मुड़कर देखा तो वहां कोई नहीं था। पेरानॉर्मल सोसायटी के उपाध्यक्ष अंशुल शर्मा ने बताया था कि हमारे पास एक डिवाइस है जिसका नाम गोस्ट बॉक्स है। इसके माध्यम से हम ऐसी जगहों पर रहने वाली आत्माओं से सवाल पूछते हैं। कुलधरा में भी ऐसा ही किया जहां कुछ आवाजें आई तो कहीं असामान्य रूप से आत्माओं ने अपने नाम भी बताए। शनिवार चार मई की रात्रि में जो टीम कुलधरा गई थी उनकी गाडिय़ों पर बच्चों के हाथ के निशान मिले। टीम के सदस्य जब कुलधरा गांव में घूमकर वापस लौटे तो उनकी गाडिय़ों के कांच पर बच्चों के पंजे के निशान दिखाई दिए। (जैसा कि कुलधरा(Kuldhara) गई टीम के सदस्यों ने मीडिया को बताया )

7/03/2016

अदभुत – एक इंसान जो लाशों को बदल देता है डायमंड में


July 03.2016

   

Hindi Story of Rinaldo Willy : The Man Who Transforms Corpses into Diamonds – यदि आप अपने किसी प्रियजन कि मृत्यु के बाद उसकी यादों को डायमंड के रूप में सहज के रखना चाहे तो आप संपर्क करे रिनाल्डो विल्ली (Rinaldo Willy) से जिनका काम लाशों को डायमंड में परिवर्तित करना है। यह बात सुनने में बड़ी ही अजीब लग सकती है पर यह है एकदम सत्य।



स्विट्ज़रलैंड के रिनाल्डो विल्ली एक कम्पनी Algordanza चलाते है जहा कि उन्नत तकनीको का प्रयोग करते हुए, इंसान के अंतिम संस्कार के बाद बची राख को डायमंड में परिवर्तित किया जाता है। Algordanza एक स्विस शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है “यादें” । कंपनी हर साल लगभग 850 लाशों को डायमंड में तब्दील कर देती है। इस काम कि कॉस्टिंग डायमंड के साइज़ पर निर्भर करती है जो कि 3 लाख से 15 लाख के बीच बैठती है।

कैसे आया यह विचार :-
रिनाल्डो विल्ली को ह्यूमन एशेज से डायमंड बनाने का विचार कैसे आया इसकी कहनी भी बड़ी रोचक है। लगभग 10 साल पहले रिनाल्डो के एक टीचर ने उसे एक आर्टिकल पढ़ने को दिया जो कि सेमी कंडेक्टर इंडस्ट्री में प्रयोग होने वाले सिंथेटिक डायमंड के उत्पादन के ऊपर था। उस आर्टिकल में यह बताया गया था कि किस तरह एशेज( राख ) से डायमंड बनाए जा सकते है। रिनाल्डो ने गलती से इसे ह्यूमन एशेज समझ लिया जबकि आर्टिकल में वेजिटेबल एशेज का जिक्र था।

loading...


रिनाल्डो को यह आईडिया पसंद आया और उसने अपने टीचर से ह्यूमन एशेज को डायमंड में बदलने के ऊपर और जानकारी मांगी। तब टीचर ने उसे बताया कि तुम गलत समझ रहे हो या ह्यूमन एशेज कि नहीं बल्कि वेजिटेबल एशेज कि बात हो रही है। इस अपर रिनाल्डो ने कहा कि अगर वेजिटेबल एशेज को डायमंड में बदला जा सकता है तो ह्यूमन एशेज को क्यों नहीं ? टीचर को यह विचार पसंद आया और उसने उस आर्टिकल के लेखक से संपर्क किया, जो कि वही स्विट्ज़रलैंड में रहता था तथा जिसके पास सिंथेटिक डायमंड बनाने कि कुछ मशीने थी। फिर उन्होंने उस आईडिया पर मिल के काम किया और कम्पनी Algordanza अस्तित्व में आई।

कैसे बनता है डायमंड : –
ह्यूमन एशेज से डायमंड बनाने के लिए वो सबसे पहले ह्यूमन एशेज को स्विट्ज़रलैंड स्तिथ अपनी लैब में मंगवाते है। लैब में एक विशेष प्रकिया के द्वारा उस ह्यूमन एशेज से कार्बन को अलग किया जाता है। इस कार्बन को बहुत अधिक तापमान पर गर्म करके ग्रेफाइट में परिवर्तित किया जाता है। फिर इस ग्रेफाइट को एक मशीन में रखा जाता है जहा पर ऐसी कंडीशन बनाई जाती है जैसी कि जमीन के बहुत नीचे होती है यानि कि बहुत अधिक दवाब और बहुत अधिक तापमान। इस कंडीशन में ग्रेफाइट को कुछ महीनो के लिए रखा जाता है जिससे कि वो ग्रेफाइट डायमंड में बदल जाता है।



सिंथेटिक डायमंड और रियल डायमंड में फर्क :-
रासायनिक संरचना और गुणों के आधार पे सिंथेटिक डायमंड और रियल डायमंड में कोई फर्क नहीं होता है। दोनों कि रासायनिक संरचना और रासायनिक गुण समान होते है। एक मात्र फर्क इनकी कीमतो में होता है। रियल डायमंड, सिंथेटिक डायमंड से महंगे आते है। इन दोनों डायमंड में फर्क करना बहुत मुश्किल होता है यहाँ तक कि एक अनुभवी ज्वेलर्स भी उनमे फर्क नहीं कर सकता है। इनमे फर्क करने का एक मात्र तरीका केमिकल स्क्रीनिंग है जो कि लैब में हो सकती है।



वर्ल्ड में इनकी फिलहाल 12 देशों में ब्रांच है, जिनमे से एशिया में 4 (जापान, सिंगापूर, हांगकांग, थाइलैंड) है। जहा कि आप अपना आर्डर दे सकते है। भारत में फिलहाल ब्रांच नहीं है। Algordanza के टोटल बिज़नस में अकेले जापान का हिस्सा 25 पर्सेंट है। इसके दो कारण है एक तो जापानिओ का अपनों के प्रति कुछ ज्यादा ही लगाव होता है और दूसरा वहाँ अधिकतर लोगो का विधुत शवगृह में अंतिमसंस्कार किया जाता है जिससे कि ह्यूमन एशेज प्राप्त हो जाती है। जबकि वेस्टर्न कन्ट्रीज में अधिकतर शवो को दफनाया जाता है।

7/02/2016

विशव के 10 सबसे बड़े हीरे (Top 10 Largest Diamonds of the World)


July 02.2016

Top 10 Largest diamonds of the World : दुनिया में एक से बेहतरीन एक डायमंड हैं। इनमें से कई की कीमत भी नहीं लगाई जा सकती है। दुनिया का सबसे बड़ा और बेशकीमती डायमंड दक्षिण अफ्रीका का है, जिसका नाम है ‘द गोल्डन जुबली’। यह बेहद चमकदार डायमंड है। माइनिंग ग्लोबल की रिपोर्ट के आधार पर हम आपको दुनिया के 10 सबसे बड़े डायमंड्स के बारे में बता रहे है।

1. द गोल्डन जुबली (The Golden Jubilee)



कैरेट: 547.67
देश: दक्षिण अफ्रीका
साल: 1985

1985 में दक्षिण अफ्रीका में मिले इस हीरे को बेहद खास माना जाता है। 545 कैरेट से ज्यादा का यह डायमंड दुनिया का सबसे बड़ा तराशा गया डायमंड है।

loading...
2. द कुल्लिनन-2 (The Cullinan II)



कैरेट: 530.20
देश: दक्षिण अफ्रीका
साल: 1905

इसका दूसरा नाम “स्टार ऑफ अफ्रीका” है। वास्तविक कुल्लिनन से कटने वाले नौ हिस्सों में से ये सबसे बड़ा हिस्सा है। यह डायमंड 530.20 कैरेट का है, जो दुनिया में पाया जाने वाला दूसरा सबसे बड़ा हीरा है। यह हीरा ग्रेट ब्रिटेन के इम्पीरियल स्टेट क्राउन के मध्य में जड़ा है।

3. द इंकम्पेयरेबल (The Incomparable)



कैरेट: 407.48
देश: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो
साल: 1980

इस डायमंड के बारे में कहा जाता है कि डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में 1984 के दौरान एक बच्चा मलबे के ढेर के पास इस हीरे के साथ खेल रहा था। इसकी अनुमानित कीमत 2 करोड़ डॉलर है।

4. द कुल्लिनन-1 (The Cullinan I – aka the Star of Africa)



कैरेट: 317.14 देश: दक्षिण अफ्रीका साल: 1905
3106 कैरेट के कुल्लिनन पत्थर से काटा गया यह दूसरा सबसे बड़ा डायमंड था। राजा एडवर्ड ने इसे खजाने के शाही मुकुट का हिस्सा बनाया था। इसकी अनुमानित कीमत 40 करोड़ डॉलर है। द कुलिनन टॉवर ऑफ लंदन में प्रदर्शनी के लिए रखा है।

5. द स्प्रिट ऑफ दे ग्रिसोगोनो (The Spirit of de Grisogono)



कैरेट: 312.24
देश: सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक
साल: अज्ञात

द स्प्रिट ऑफ दे ग्रिसोगोनो दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा और दुनिया का पहला सबसे बड़ा काला हीरा है। वेस्टर्न सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिकन में यह हीरा मिला था। आज यह हीरा सफेद सोने की अंगूठी में लगा है। इसके चारों ओर 702 सफेद हीरे जड़े हैं और जिनका वजन 36.69 कैरेट है।

6. द सेंटेनरी (The Centenary)



कैरेट: 273.85
देश: दक्षिण अफ्रीका
साल: 1986

यह भी एक बेशकीमती हीरा है, जिसे 17 जुलाई 1986 में खोजा गया था। इसका वास्तविक पत्थर 599 कैरेट का था। फिलहाल इसके मालिक, स्थान और इसकी कीमत का अंदाजा किसी को नहीं है। लेकिन 1991 में इसकी कीमत 10 करोड़ डॉलर आंकी गई थी।

7. द जुबली (The Jubilee)



कैरेट: 245.35
देश: दक्षिण अफ्रीका
साल: 1985

1895 में दक्षिण अफ्रीका की जेगर्सफॉन्टेन खान में द जुबली हीरा मिला था। द जुबली हीरे को रिट्ज के नाम से जाना जाता है। इस डायमंड को यह नाम दक्षिण अफ्रीका के फ्री स्टेट प्रांत के राष्ट्रपति फ्रांसिस विलियम रिट्ज के नाम पर मिला है।

8. द डी-बियर कैरेट (The De Beers)



कैरेट: 234.65
देश: दक्षिण अफ्रीका
साल: 1888

साल 1988 में दक्षिण अफ्रीका में यह डायमंड निकाला गया था। दक्षिण अफ्रीका के किम्बर्ली परिसर में मिलने वाला यह सबसे बड़ा डायमंड था। यह दुनिया का 8वां सबसे बड़ा हीरा है।

9. द रेड क्रॉस (The Red Cross)



कैरेट: 205.07
देश: दक्षिण अफ्रीका
साल: 1905

यह डायमंड अपने कनारी पीले रंग के लिए जाना जाता है। 205.07 कैरेट का यह डायमंड तकिये के आकार में काटा गया था। इसे कई डायमंड कंपनियों ने ‘नायाब हीरे’ का खिताब दिया था।

10. द मिलेनियम स्टार (The Millennium Star)



कैरेट: 203.04
देश: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो
साल: 1990

इस डायमंड की खोज के बाद दुनिया की सबसे बड़ी डायमंड कंपनी डी-बियर ने इसे खरीद लिया था। इसके बाद डायमंड कंपनी स्टाइनमेट्ज ग्रुप की सब्सिडियरी कंपनी एस्कॉट डायमंड को इसकी कटाई और आकार देने में 3 साल लगे। डी-बियर के चेयरमैन रहे हैरी ऑफेनहाइमर ने एक बार कहा था कि यह मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हीरा है।

कहानी 10 बेशकीमती भारतीय हीरों की, जो अब है विदेशी तिजोरियों में


July 02.2016

Top 10 Ancient Indian Diamond Story & History in Hindi : भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था और इसकी बड़ी वजह थी विदेशी आक्रांताओं को यहां मिली आकूत दौलत। लेकिन इस दौलत में देश की कुछ धरोहरें ऐसी भी थीं जो अनमोल थीं। इन्हीं में से कुछ थे बेशकीमती हीरे। आपको जानकार शायद आश्चर्य होगा की 18वीं शताब्दी में ब्राजील में डायमंड खदानों की खोज से पूर्व पुरे विशव में केवल भारत में ही हीरे की माइनिंग होती थी और वो भी सदियों से। लेकिन महमूद ग़ज़नवी से लेकर अंग्रेजों तक, सब विदेशी आक्रमणकारीयों ने हमारी इन अनमोल धरोहरों को लूटा। इसका परिणाम यह हुआ की भारत की शान कह जाने वाले ये बेशकीमती हीरे आज विदेशी तिजोरियों में बंद है। आज इस लेख में हम आपको ऐसे ही 10 प्राचीन बेशकीमती हीरों का सम्पूर्ण इतिहास बताएँगे।

1. कोहिनूर डायमंड (Kohinoor diamond)

भारत का गौरव कहे जाने वाले कोहिनूर की बात करें तो ये इस समय ब्रिटेन की महारानी के ताज की शोभा बढ़ा रहा है। कोहिनूर को अकबर से लेकर शाहजहां तक ने पहना, फिर वो लुटकर ईरान चला गया और वापस भारत आया भी तो अंग्रेज ले गए। कोहिनूर सबसे पहले 12वीं शताब्दी में काकतीय साम्राज्य के पास था। जहां वारंगल के एक मंदिर में कोहिनूर हिंदू देवता की आंख के तौर पर मंदिर की शोभा बढ़ा रहा था। सबसे पहले वहां से अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मालिक काफूर ने 1310 में इसे लूट लिया और खिलजी को भेंट कर दिया। इसके बाद इसने दिल्ली सल्तनत के विभिन्न राज्यों की शोभा बढ़ाई। बाबर ने 1526 में इब्राहिम लोधी से दिल्ली की सत्ता छीनने के साथ ही इसे भी छीन लिया। बाबर के बाद हुमायूं ने इसे ‘बाबर हीरे’ का नाम दिया। तब से कोहिनूर मुगल सल्तनत के पास बना रहा। मुगल सल्तनत के आखिरी दिनों में इसे ईरानी आक्रमणकारी नादिर शाह ने लूट लिया। जहां से उसे अफगानिस्तान का शासक अमहद शाह दुर्रानी अपने साथ ले गया। इसके बाद उसके उत्तराधिकारी शुजा शाह दुर्रानी ने अफगानिस्तान से भागकर लाहौर आने के बाद शरण मांगी और कोहिनूर को महाराजा रणजीत सिंह को भेंट कर दिया। कहा जाता है कि महाराजा रणजीत सिंह से छल करके अंग्रेज इसे इंग्लैंड ले गए। लेकिन दूसरी थ्योरी के मुताबिक बताया जाता है कि इसे महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद उनके 13वर्षीय वारिस दिलीप सिंह ने अंग्रेजों को भेंट कर दिया और फिर इसे महारानी विक्टोरिया के ताज में जड़वा दिया गया और तब ये अंग्रेजों के पास है।

2. दरिया-ए नूर डायमंड(Darya-e-noor diamond)

कोहिनूर के साथ ही दरिया-ए-नूर को नादिर शाह दिल्ली से ईरान ले गया था। मयूर सिंहासन और कोहिनूर के साथ ही ईरान गए दरिया-ए-नूर को भी पंजाब के महाराज रणजीत सिंह ने ईरान से अफगानिस्तान जाने के बाद हासिल कर लिया था। कहा जाता है कि अंग्रेजों की प्रदर्शनी के बाद इसे ढाका के नवाब ने खरीद लिया था। और ये वर्तमान समय में ढाका के सोनाली बैंक की तिजोरी में सुरक्षित रखा गया है। इसकी 1985 में एक प्रदर्शनी भी लगाई जा चुकी है। वहीं, दूसरे पक्ष का कहना है कि दरिया-ए-नूर दो भागों में था, जिसका दूसरा भाग नूर-अल-एन अब भी ईरान में सुरक्षित है।

loading...
3. रीजेंट डायमंड (Regent diamond)

द रीजेंट आंध्र प्रदेश के कोलार की खान से निकला। तब इसका वजन 410 कैरेट था, लेकिन वर्तमान समय में कई बार चमकाए जाने की वजह से इसका वजन अब 140 कैरेट है। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर थॉमस पिट ने इसे एक व्यापारी से लेकर फ्रांस भेज दिया। जिसके बाद ये फ्रांस के शाही खजाने का हिस्सा बना। इसे फ्रांस के के सम्राट लुई 14वें ने 1717 में फ्रांस के प्रतिनिधि रहे ऑर्लिंन के ड्यूक फिलिप द्वितीय से खरीदा था। इसके बाद फ्रांस के सम्राट बने लुई 15वें ने 1722 में इसे अपने ताज में जड़वा लिया। ये लुई 16वें के ताज का हिस्सा भी रहा। इस दौरान 1792 में फ्रांसीसी क्रांति के समय ये चोरी हो गया, लेकिन बाद में मिल गया। कई बड़े लोगों के पास से होता हुए ये 1801 में फ्रांस के महान नेपोलियन बोनापार्ट के पास पहुंचा। नेपोलियन ने इसे अपनी तलवार के मूठ में जड़वा कर हमेशा के लिए अपने पास रखा लिया, लेकिन नेपोलियन की हार के साथ ही उसकी दूसरी पत्नी इसे लेकर ऑस्ट्रिया चली गई। जहां से बाद में द रीजेंट फिर से फ्रांस लौटा और लुई 18वें, चार्ल्स 10वें और नेपोलियन तृतीय के ताज का हिस्सा बना और 1887 के बाद से इसे लूव्र म्यूजियम के हवाले कर दिया गया। वर्तमान में ये फ्रांस के सबसे बड़े लूव्र संग्रहालय, पेरिस में ही सुरक्षित है।

4. ब्रोलिटी ऑफ इंडिया डायमंड (Briolette of India diamond)

गुमनाम भारतीय हीरों की लिस्ट में अगला नाम है ब्रोलिटी ऑफ इंडिया का। 90.8 कैरेट के ब्रोलिटी को कोहिनूर से भी पुराना बताया जाता है। 12वीं शताब्दी में भारत से किसी तरह फ्रांस की महारानी में इसे खरीदा। इस हीरे को पूरी दुनिया का सबसे शानदार हीरा बताया जाता है, क्योंकि रंगहीन होने की वजह से इसे शुद्धतम माना जाता है। इस हीरे को फ्रांस के कई शासकों किंग रिचर्ड जिन्हें शेरदिल भी कहा जाता है, का संरक्षण मिला। बाद में ये हीरा कई सालों तक दुनिया की नजरों से ओझल रहा और तीन शताब्दियों बाद किंग हेनरी द्वितीय के समय में सामने आया। उनके बाद इसे राजकुमारियों को सौंप दिया गया। कुछ समय बाद सम्राट ने कैथरीन नाम की रानी से पूरे गहने ले लिए, जिसमें ब्रोलिटी ऑफ इंडिया भी शामिल था। उसके बाद से ये हीरा दुनिया की चर्चाओं से एक बार फिर से ओझल हो गया। हालांकि 1910 में इसे फ्रांस के किसी व्यापारी ने अमेरिकन व्यापारी जॉर्ज ब्लूमेंथल को बेच दिया। जॉर्ज ब्लूमेंथल ने इसे अपनी पत्नी को भेंट कर दिया। इसके बाद कई सालों तक न्यूयॉर्क के व्यापारी हैरी विंस्टन ने इसे रखा और फिर 1950 में कनाडा के अरबपति व्यापारी को बेच दिया, जिसकी मौत तक ब्रोलिटी ऑफ इंडिया उसी के पास रहा। इसके बाद ब्रोलिटी ऑफ इंडिया की कई प्रदर्शनियां लगीं और लगभग 40 साल पहले किसी गुमनाम यूरोपीय परिवार ने इसे खरीद लिया। तब के बाद से इस हीरे की कोई खबर नहीं है।

5. ओर्लोव डायमंड (Orlov diamond)

ओर्लोव का इतिहास अब तक के ज्ञात सभी बड़े हीरों में सबसे पुराना है और ये सबसे बड़ा भी है। ये हीरा अंडे के आधे आकार का है और दूसरी शताब्दी से श्रीरंगपट्टम (तमिलनाडु) में कावेरी नदी के किनारे बने श्री रंगानाथस्वामी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति में आंख के रूप में था। भगवान विष्णु की मूर्ति से इसे एक फ्रांसीसी सैनिक, जोकि कर्नाटक युद्ध के समय हिंदू बन गया था, ने निकाले जाने के बाद सालों तक सहेजकर रखा। इसे फ्रांसीसियों द्वारा 1750 के दौरान मद्रास लाया गया और अंग्रेजी सेना के किसी अफसर के हाथों बेच दिया गया। ये हीरा उसके बाद कई बार बिका और इंग्लैंड चला गया। इंग्लैंड से इस हीरे को ईरानी अरबपति शफरास ने खरीदा और फिर उसे ग्रिगोरी ग्रिगोरिविच ओर्लोव के हाथों 4 लाख डच मुद्रा में बेच दिया। बाद में ग्रिगोरी ओर्लोव ने इसे अपनी रूसी प्रेमिका कैथरीन को भेंट किया। कैथरीन ने बाद में रूस के महाराज पीटर तृतीय से शादी की, तब भी ओर्लोव को अपने पास रखा। हालांकि बाद में कैथरिन ने रूस के महाराज को ये गिफ्ट कर दिया। इसके बाद कैथरीन ने ही 1784 में इसे ओर्लोव डायमंड नाम दिया।

6. शाह डायमंड (Shah Diamond)

शाह डायमंड 1450 के आसपास गोलकुंडा की मशहूर खान से निकला था। ये उत्पत्ति से रंगहीन है, लेकिन आयरन ऑक्साइड की वजह से इसका रंग हल्का पीला हो गया है। ये हीरा शुरू में 95 कैरेट का था, लेकिन तराशे जाने के बाद 88.7 कैरेट का रह गया है। ये विशुद्ध भारतीय शैली में तराशा गया है। शाह डायमंड मूल रूम से तिकोने आकार में है, जिसके तीनों ओर उन तीन शासकों के नाम लिखे हैं, जिनके शासनकाल में ये हीरा रहा। इसपर एक ओर अहमदनगर के निजाम का नाम निजाम शाह:1000 लिखा है, तो दूसरी ओर जहां शाह:1051 और तीसरी ओर फतेह अली शाह:1242 अंकित है। ये तारीखें हिजरी संवत के हिसाब से हैं, जिन्हें ईसा संवत में क्रमश: 1591, 1641 और 1826 समझा जा रहा है। ये भले ही दुनिया के बेहतरीन हीरों में से नहीं है, लेकिन अपने ऐतिहासिक स्वरूप की वजह से इसे बेहद खास माना जाता है। इस हीरे को अहमदनगर के निजाम से मुगल बादशाह अकबर ने हासिल किया। इसके बाद उनके पोते शाहजहां ने अपना नाम और समय (जहां शाह:1051) अंकित कराया। इसके बाद औरंगजेब ने इसे तरशवाया। ये एक पत्थर के स्वरूप में है, जिसे थ्रोन डायमंड के नाम से भी जाना जाता है। शाह डायमंड 1738 तक दिल्ली में मुगल बादशाहों के पास रहा, जिसे बाद में ईरानी आक्रमणकारी नादिर शाह इसे ईरान ले गया। वहां काफी समय बाद 1826 में ईरान के बादशाह फतेह अली शाह ने तीसरे कोने पर अपना नाम और समय (फतेह अली शाह:1242) अंकित कराया। ये कहानी यूं ही नहीं खत्म होती। दरअसल 1829 में रूसी राजनयिक की तेहरान में हत्या कर दी गई। जिसके बदले में रूसी जार ने ईरान को दंड देने का आदेश दिया। जार के आदेश से घबराए ईरानी राजा फतेह अली शाह ने अपने पोते खुसरो मिर्जा को शाह डायमंड के साथ सेंट पीट्सबर्ग भेजा, जिसने जार से मुलाकात की और शाह डायमंड को भेंट स्वरूप जार निकोलस को सौंप दिया। तब ये शाह डायमंड रूसी खजाने का हिस्सा बना और रूसी क्रांति के समय तक हिस्सा बना रहा। जहां से क्रांतिकारियों ने इसे क्रेमलिन डायमंड फंड को सौंप दिया और तब से ये वहीं पर है।

7. आईडोल आई डायमंड (Idol eye diamond)

आईडोल आई को अंग्रेजों ने तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान नासिक के नजदीक त्रयंबकेश्वर शिव मंदिर से चुराया था। ये हीरा 1500 से 1817 तक भगवान शिव की आंख के रूप में मूर्ति में लगा था। जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने चुरा लिया था। युद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेजों ने पेशवा बाजीराव को हीरा लौटा दिया। जिसे अंग्रेज कर्नल जे ब्रिंग्स ने बाद में हासिल कर लिया। इसके बाद इस हीरे को लंदन भेज दिया दया। जहां से इसे 1818 में हीरों का व्यापार करने वाली ब्रिटिश कंपनी रुंदेल एंड ब्रिज ने खरीदा। इस कंपनी ने आईडोल आई को 1818 में फिर से तराशा और वेस्टमिंस्टर के राजकुमार रॉबर्ट ग्रॉसवेनर की पोशाक में लगा दिया। जहां से बाद में किसी अमेरिकी व्यापारी ने 1927 में इसे खरीद लिया और अमेरिका ले गया। तब से ये हीरा कई व्यापारियों के पास गया और फिलहाल ग्रीनविच के व्यापारी एडवर्ड जे हैंड के पास है। जिन्होंने आखिरी बार 1970 में इसे खरीदा था। इस हीरे का नाम नासाक डायमंड भी है, जिसके नाम पर ब्रिटिश एयरवेज कंपनी ने दिसंबर 1982 में खरीदे अपने एक हवाई जहाज का नाम ‘द नासाक डायमंड’रखा।

8. ब्लू होप डायमंड (Blue hope diamond)

द ब्लू होप भारतीय मूल के सर्वाधिक चर्चित हीरों में से एक है। इसे एक फ्रांसीसी व्यापारी 1650 ईस्वी के आसपास भारत से चुराकर फ्रांस ले गया था। वहां से फ्रांस के महाराजा लुई 14वें ने ये हीरा खरीद लिया। इसके बाद ये लुई 15वें, लुई 16वें के पास रहा। और फिर नेपोलियन के पास भी रहा। यहां से 1812 के आसपास ब्लू होप को अंग्रेज व्यापारी ने खरीद लिया। और कई हाथों से होता हुआ ये इंग्लैंड के राजा जॉर्ज चतुर्थ के पास पहुंचा। हालांकि आधिकारिक रूप से इसे ब्रिटिश राजशाही गहनों में जगह नहीं मिली। यहां से 1830 ईस्वी के आसपास ब्रिटिश बैंकर थॉमस होप ने इसे खरीदा और 1839 में प्रदर्शनी में जगह दी। यहां से सालों बाद कई व्यापारियों के हाथों से होता हुआ ब्लू होप 1905 के आसपास अमेरिका पहुंच गया। जहां इसके कई मालिक बने, लेकिन ये हीरा किसी के पास भी नहीं टिका। आखिर में इसे न्यूयॉर्क के स्मिथसोनियन म्यूजियम को दे दिया गया। जहां ये हीरा साल के 364 दिन लोगों के देखने के लिए रखा रहता है।

9. ब्लैक ओर्लोव डायमंड (Black Orlov diamond)

यह हीरा पुडुचेरी मंदिर से चोरी हुआ और भगवान ब्रह्मा की मूर्ति से निकाला गया। इसे ब्रह्मा की तीसरी आंख के रूप में मूर्ति में लगाया गया था। यहां से इसे चोरों ने किसी तरह से यूरोप पहुंचा दिया और इसे कई लोगों ने अपने पास रखा, लेकिन लंबे समय तक कोई नहीं रख सका। क्योंकि इस हीरे को जो भी अपने पास रखता, उसकी अकाल मौत हो जाती थी। 1932 में जे डब्ल्यू पेरिस ने किसी अमेरिकी व्यक्ति से इसे खरीदा। लेकिन बाद में उन्होंने न्यूयॉर्क की एक बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली। इसके बाद में रूस की राजकुमारियों लिओनिला गैलिस्टाइन और नादिया वाइजिन ओर्लो ने इसे खरीदा। जिसके बाद इस हीरे का नाम ब्लैक ओर्लोव पड़ा। क्योंकि इस हीरे को रखने वाले की अकाल मौत होने की कहानी इसके साथ ही जुड़ गई थी। दोनों ने 1940 के दशक में ऊंची बिल्डिंग से कूदकर जान दे दी। इसके बाद इसे चार्ल्स एफ. विंसन ने खरीदा और 3 हिस्सों में कटवाकर तरशवाया, ताकि इसके साथ मौत के खेल को खत्म कर सकें। उन्होंने इसे 108 हीरों के गुच्छों के साथ हार में जड़वा दिया। बाद में इसे 2004 में अमेरिका से पेंसिलवेनिया के हीरा व्यापारी डेनिस पेट्मिजास ने खरीद लिया, और कई प्रदर्शनियों में शामिल किया।

10. ग्रेट मुगल डायमंड (Great Mughal diamond)

भारत के सबसे बड़े हीरे की बात करें तो नाम आता है ग्रेट मुगल का। गोलकुंडा की खान से 1650 में जब यह हीरा निकला तो इसका वजन 787 कैरेट था। यानी कोहिनूर से करीब छह गुना भारी। कहा जाता है कि कोहिनूर भी ग्रेट मुगल का ही एक अंश है। इस हीरे को अमीर जुमला ने मुगल सम्राट शाहजहां को पारिवारिक संबंधों के चलते भेंट किया था। जिसके बाद ये मुगल सल्तनत का हिस्सा बना। कहा जाता है कि शाहजहां ने इसे तरशवाने में उस समय 10 हजार रुपये खर्च किए। जिसके बाद इसे 6 भागों में बांटा गया। इसे शाहजहां से पुत्र औरंगजेब ने 1665 में फ्रांस के जवाहरात के व्यापारी को दिखाया था, जिसने इसे अपने समय का सबसे बड़ा रोजकट हीरा बताया था। इस हीरे का इतिहास 1739 तक ही ज्ञात है। कहा जाता है कि इसे ईरानी आक्रमणकारी नादिर शाह कोहिनूर, दरिया-ए-नूर के साथ अपने साथ ईरान ले गया। कहते हैं कि इस हीरे को छिपाने के लिए इसके कई टुकड़े कर दिए गए। लेकिन फिलहाल ये हीरा कहां है, ये किसी को नहीं मालूम।

Popular Posts

Categories

Blog Archive

Featured post

दुनिया की सबसे खुबसूरत गुफाएं – Most Beautiful Caves of the World

 July 09.2016 दोस्तों, प्रकृति की खूबसूरती का कोई जवाब नहीं होता, लेकिन सिर्फ़ ऊपर ही नहीं धरती के गर्भ में भी कई ऐसी ही खूबसूरती बसी...

Contact Form

Name

Email *

Message *












.

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner